संसद से चुनाव आयोग तक निकला मार्च भले ही पुलिस बैरिकेडिंग के कारण निर्वाचन सदन तक नहीं पहुंच सका, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह अब सिर्फ राहुल गांधी बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का राजनीतिक टकराव नहीं रह गया है। सवाल चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता, मतदाता सूची में बदलाव, आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की जवाबदेही तक पहुंच चुका है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है।
सड़क पर उतरा विपक्ष, लेकिन निशाने पर सिर्फ CEC नहीं
मंगलवार, 6 अक्टूबर को करीब 150 विपक्षी सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया। उनकी मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब की थी। पुलिस ने मार्च को संसद मार्ग पर रोक दिया। इसके बाद सांसद धरने पर बैठ गए।
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा बाद में आकाशवाणी भवन परिसर में भी पहुंच गए और कई घंटे तक धरना दिया। अंततः पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत अन्य नेताओं को हिरासत में लिया और रात में उन्हें रिहा कर दिया।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीर का बड़ा हिस्सा कैमरों के सामने था—बैरियर पर चढ़ते राहुल गांधी, हाथ में तिरंगा, धरने पर बैठे विपक्षी सांसद और फिर पुलिस हिरासत।
इसके पीछे असली कहानी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों की है।
'वोट चोरी' का राजनीतिक नारा, सवाल संवैधानिक संस्था की साख पर
राहुल गांधी पिछले कुछ समय से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर 'वोट चोरी' का आरोप लगा रहे हैं। मंगलवार का प्रदर्शन इस अभियान को एक नए स्तर पर ले गया।
अब कांग्रेस का सवाल केवल यह नहीं है कि मतदाता सूची में कितने नाम जुड़े या हटे। या फिर बीजेपी के दबाव में जानबूझकर आयोग ने वर्ग विशेष के लोगों के नाम काटे। सवाल जो विपक्ष उठा रहा है वो ये है कि निर्णय कैसे लिए गए? किसकी सहमति से लिए गए? आयोग के भीतर असहमति की क्या भूमिका रही? और राजनीतिक दलों को उन निर्णयों की पर्याप्त जानकारी क्यों नहीं मिली? यानी आयोग के भीतर ही असहमतियां हैं।
विपक्ष का ये दांव पूरे मामले को बेहद गंभीर बना देता है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के फैसलों से संबंधित कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में निर्णय प्रक्रिया, एजेंडा, मिनट्स और मतदाता सूची से जुड़े कुछ कदमों पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई।
अगर इन आपत्तियों को पूरी तरह राजनीतिक आरोप मानकर खारिज कर दिया जाए तो भी एक सवाल बचता है—चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
और यही वह सवाल है जिसे कांग्रेस राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने में सफल होती दिख रही है।
चुनाव आयोग की सबसे बड़ी चुनौती: आरोपों से ज्यादा 'विश्वास' का सवाल
चुनाव आयोग लोकतंत्र की ऐसी संस्था है जिसकी विश्वसनीयता केवल कानून और संवैधानिक अधिकारों से नहीं बनती, बल्कि जनता के विश्वास से बनती है। एक तरह से देखा जाए तो चुनाव आयोग को ये भरोसा कमाना पड़ता है।
यूं देखा जाए तो चुनाव हारने वाली पार्टी का आयोग पर आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब मतदाता सूची, SIR और आयोग के भीतर दर्ज कथित असहमतियों जैसे मुद्दे एक साथ सामने आते हैं तो विवाद का दायरा बढ़ जाता है।
इसी वजह से कांग्रेस ने इस लड़ाई को केवल चुनावी अनियमितता का मुद्दा नहीं रहने दिया। उसने इसे संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही का मुद्दा बनाने की कोशिश की है। आप चाहें तो इसे कांग्रेस और समूचे विपक्ष की उपलब्धि के तौर पर देख सकते हैं।
चुनाव आयोग के पक्ष को नजरअंदाज करना भी सही नहीं
इस पूरी बहस में चुनाव आयोग का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से संबंधित रिपोर्ट पर कहा था कि अलग-अलग विचार निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं और आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने उन आपत्तियों के अस्तित्व को नकारने के बजाय उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
Form 6 को लेकर राहुल गांधी के आरोपों पर भी आयोग ने कहा कि बिहार में SIR का फैसला किसी एक CEC का फैसला नहीं था, बल्कि आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को बरकरार रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आयोग के पक्ष को स्वीकार करते हुए प्रक्रिया को बरकरार रखा था।
इसलिए यह कहना कि अदालत ने चुनाव आयोग की पूरी कार्यप्रणाली को गलत ठहरा दिया है, तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा।
लेकिन यहां भी कांग्रेस के पास राजनीतिक सवाल पूछने की पर्याप्त जमीन है—किसी प्रक्रिया का कानूनी रूप से वैध होना और उस प्रक्रिया का पर्याप्त रूप से पारदर्शी होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
मंगलवार की घटना ने इसी अंतर को बड़ा कर दिया
मंगलवार को एक और विवाद सामने आया। विपक्षी सांसदों ने कहा कि वे चुनाव आयोग से मिलकर अपनी बात रखना चाहते थे। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने रात में जारी स्पष्टीकरण में कहा कि शाम चार बजे तक किसी राजनीतिक दल ने प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के लिए औपचारिक अनुरोध नहीं किया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस के माध्यम से राहुल गांधी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के मिलने की जानकारी मिली। आयोग ने अपने 2025 के बैठक प्रोटोकॉल का हवाला भी दिया। यानी अब विवाद का एक और प्रश्न सामने आ गया—क्या विपक्ष वास्तव में आयोग से संवाद चाहता था और क्या संवाद के लिए उपलब्ध संस्थागत रास्ते पर्याप्त थे?
राहुल गांधी ने विरोध को 'इवेंट' नहीं, अभियान बनाने की कोशिश की
राहुल गांधी के लिए मंगलवार का प्रदर्शन केवल दिल्ली की एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था।
पिछले दिनों कांग्रेस ने 'वोट बचाओ, देश बचाओ' जैसे अभियान के जरिए चुनाव आयोग और SIR के खिलाफ आंदोलन को राज्यों तक ले जाने की घोषणा की है।
इससे संकेत साफ है—कांग्रेस इस मुद्दे को संसद के अंदर के हंगामे तक सीमित रखने के बजाय जनता के बीच ले जाना चाहती है।
राहुल गांधी की रणनीति भी इसी दिशा में दिखाई देती है। वह चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर खुद को केवल विपक्ष के नेता के रूप में नहीं, बल्कि 'वोट के अधिकार' की लड़ाई लड़ने वाले नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक रूप से यह रणनीति कितनी सफल होगी, यह अलग सवाल है। लेकिन इतना जरूर है कि इसने चुनाव आयोग को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
विपक्ष को भी अब आरोपों से आगे बढ़ना होगा
यहां कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है।
अगर 'वोट चोरी' का आरोप केवल राजनीतिक नारा बनकर रह जाता है, तो उसका असर सीमित हो सकता है। लेकिन अगर कांग्रेस दस्तावेजों, मतदाता सूची के आंकड़ों, नामों के सत्यापन, निर्वाचन क्षेत्रों के तुलनात्मक आंकड़ों और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर अपने आरोपों को लगातार साबित करने की कोशिश करती है, तो यह बहस कहीं ज्यादा गंभीर रूप ले सकती है।
दूसरे शब्दों में, अब कांग्रेस को सड़क के आंदोलन के बाद सबूतों की राजनीति करनी होगी।
यही तय करेगा कि 'वोट चोरी' एक प्रभावी राजनीतिक नैरेटिव बनता है या केवल चुनावी राजनीति का एक और आरोप साबित होता है।
चुनाव आयोग के सामने भी अब चुनौती कम नहीं
दूसरी तरफ चुनाव आयोग के सामने भी स्थिति आसान नहीं है।
चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता तभी मजबूत होगी जब वह हर बड़े सवाल का जवाब अधिकतम पारदर्शिता के साथ दे सके। SIR जैसे बड़े पैमाने के मतदाता पुनरीक्षण अभियान में करोड़ों मतदाताओं के नाम और पात्रता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में प्रक्रिया के हर चरण की सार्वजनिक व्याख्या, डेटा की उपलब्धता और राजनीतिक दलों के साथ संवाद आयोग की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यही वजह है कि अब आयोग के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रक्रिया कानून के मुताबिक है। जनता यह भी जानना चाहेगी कि प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और उस पर भरोसा क्यों किया जाए।
तो क्या कांग्रेस ने चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर दिया?
राजनीतिक तौर पर देखें तो हां, कांग्रेस और राहुल गांधी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को एक ऐसे सार्वजनिक सवाल के केंद्र में जरूर ले आए हैं, जिससे आयोग को लगातार जवाब देना पड़ रहा है।
मंगलवार का प्रदर्शन इस अभियान का दृश्यात्मक चरम था, लेकिन इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि इससे कहीं बड़ी है—SIR, मतदाता सूची में बदलाव, आयोग के भीतर कथित असहमति, राजनीतिक दलों और आयोग के बीच संवाद और चुनावी संस्थाओं की पारदर्शिता।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस द्वारा लगाए गए सभी आरोप साबित हो चुके हैं। बिहार SIR को सुप्रीम कोर्ट से समर्थन मिला है और चुनाव आयोग अपने फैसलों को सामूहिक एवं नियमसम्मत बता रहा है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था की मजबूती का पैमाना सिर्फ यह नहीं होता कि उसके फैसले अदालत में टिकते हैं। एक दूसरा पैमाना जनता का भरोसा भी है।
और फिलहाल राहुल गांधी की राजनीति ने चुनाव आयोग के सामने यही सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या चुनाव आयोग केवल संवैधानिक रूप से स्वतंत्र दिखाई देता है, या उसकी हर निर्णय प्रक्रिया जनता और राजनीतिक दलों को भी उतनी ही पारदर्शी दिखाई देती है?
आने वाले दिनों में कांग्रेस के आंदोलन, विपक्ष की संभावित संसदीय कार्रवाई और चुनाव आयोग के जवाब इस सवाल का दायरा और बड़ा कर सकते हैं।
मोटे तौर पर देखा जाए तो कांग्रेस की कोशिश है कि ये लड़ाई कांग्रेस या राहुल वर्सेज ज्ञानेश कुमार तक सीमित न रह जाए। बल्कि ये मौजूदा दौर में भारतीय चुनावी प्रक्रिया से खत्म होते भरोसे को फिर से स्थापित करने की लड़ाई के तौर पर देखा जाए। कांग्रेस भी यही चाहती है कि भारत की आम जनता ये समझे कि वो उन्ही के लिए लड़ रही है और फिलहाल के हालात में ऐसा होता दिख भी रहा है।