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1 OCT 2026 · राजनीति

तो परिवार के 'आनंद' के लिए दिल्ली से लौटे हैं हरीश रावत, 2027 से पहले फिर उसी मुकाम पर कांग्रेस ?

देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर चर्चाएं तेज होने लगी हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने अपने छोटे बेटे आनंद रावत को विधानसभा चुनाव लड़ाने की इच्छा खुलकर जाहिर की है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी में संभावित उम्मीदवारों को लेकर शुरुआती स्तर पर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।

हरीश रावत और आनंद रावत को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस में टिकट की चर्चा

हरीश रावत ने अपनी बात रखते हुए यह भी संकेत दिया कि अंतिम निर्णय कांग्रेस को करना है। उन्होंने ऐसे क्षेत्र में आनंद को अवसर देने की बात कही, जहां पार्टी लंबे समय से चुनाव नहीं जीत सकी है और कोई मजबूत स्थानीय दावेदार नहीं है। साथ ही उनका कहना है कि यदि किसी सीट पर किसी दूसरे नेता की दावेदारी अधिक मजबूत है तो केवल उनके बेटे होने के आधार पर आनंद को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए।

यही दूसरा हिस्सा इस बयान को महज ‘बेटे के लिए टिकट की मांग’ से आगे ले जाता है। ऐसा लगता है कि मानों हरीश रावत अपने 'परिवार के आनंद' के लिए दिल्ली से देहरादून वापस लौटे हैं। 

हरीश रावत ने अचानक क्यों उठाया आनंद का नाम?

हरीश रावत ने कहा है कि वह लंबे समय से आनंद से चुनाव लड़ने के लिए इंतजार करने को कहते रहे हैं। अब उनकी इच्छा है कि आनंद को विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक भूमिका स्थापित करने का अवसर मिले। रावत ने इसे अपनी राजनीतिक सोच और ‘उत्तराखंडियत’ की विचारधारा को आगे बढ़ाने से भी जोड़ा है।

इस बयान का समय भी महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों में गतिविधियां बढ़ रही हैं और हरीश रावत खुद भी हाल के दिनों में चुनाव को लेकर सार्वजनिक रूप से सक्रिय नजर आए हैं। उन्होंने हरिद्वार जिले की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर की है।

ऐसे में आनंद का नाम सामने आना रावत परिवार की अगली राजनीतिक पारी को लेकर चर्चा बढ़ाता है।

रावत परिवार की राजनीति में पहले से मौजूद है अगली पीढ़ी

आनंद रावत की संभावित चुनावी दावेदारी को समझने के लिए रावत परिवार की मौजूदा राजनीतिक भूमिका को देखना भी जरूरी है।

हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस विधायक हैं। उनके बड़े बेटे वीरेंद्र रावत भी 2024 में हरिद्वार लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी रह चुके हैं। ऐसे में अगर आनंद रावत भी विधानसभा चुनाव लड़ते हैं तो रावत परिवार के कई सदस्य प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में दिखाई देंगे।

यहीं से कांग्रेस के लिए एक अहम राजनीतिक प्रश्न सामने आता है—पार्टी व्यक्तिगत राजनीतिक विरासत और संगठन में मौजूद दूसरे दावेदारों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी?

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‘परिवार’ बनाम ‘संगठन’ की बहस का नया अध्याय

कांग्रेस में टिकट वितरण के दौरान अक्सर स्थानीय संगठन, क्षेत्रीय समीकरण, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की दावेदारी जैसे मुद्दे सामने आते हैं। आनंद रावत का नाम आने के बाद इन सभी पहलुओं की चर्चा स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है।

हालांकि, हरीश रावत ने अपने बयान में स्वयं यह संकेत दिया है कि किसी मजबूत दावेदार की कीमत पर उनके बेटे को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि यदि पार्टी को किसी दूसरे उम्मीदवार में बेहतर चुनावी संभावना दिखाई देती है तो उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इसलिए फिलहाल इसे कांग्रेस के आधिकारिक टिकट निर्णय के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह एक वरिष्ठ नेता की ओर से अपने बेटे की राजनीतिक दावेदारी के समर्थन में व्यक्त की गई इच्छा है।

आनंद रावत के लिए दावेदारी का आधार क्या है?

आनंद रावत पहले से कांग्रेस की राजनीति और संगठन से जुड़े रहे हैं। ऐसे में उनकी दावेदारी केवल पारिवारिक पहचान पर आधारित नहीं है। दूसरी तरफ, विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनना अलग राजनीतिक चुनौती है, जिसमें संबंधित क्षेत्र में संगठनात्मक नेटवर्क, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं।

यही वजह है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व आनंद के नाम पर विचार करता है तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि वह हरीश रावत के बेटे हैं, बल्कि यह भी होगा कि किस विधानसभा क्षेत्र में उनकी राजनीतिक दावेदारी पार्टी की रणनीति से मेल खाती है।

डीडीहाट का उदाहरण और दिलचस्प संकेत

हरीश रावत ने बातचीत में डीडीहाट जैसे क्षेत्र का उदाहरण देते हुए ऐसी सीटों पर मजबूत उम्मीदवार की जरूरत की बात कही, जहां कांग्रेस लंबे समय से चुनाव नहीं जीत सकी है। इससे संकेत मिलता है कि वह आनंद को किसी पारंपरिक रूप से मजबूत कांग्रेस सीट की बजाय ऐसी सीट से अवसर देने की संभावना की बात कर रहे हैं, जहां पार्टी नए राजनीतिक चेहरे के साथ चुनावी रणनीति बना सकती है।

हालांकि, आनंद रावत को किसी विशेष सीट से उम्मीदवार बनाए जाने की कोई बात पार्टी के किसी बड़़े नेता ने नहीं की है लेकिन खबरें हैं कि आनंद रावत ने डीडीहाट में अपना ठिकाना बना रखा है। 

कांग्रेस नेतृत्व के सामने क्या सवाल होंगे?

आनंद रावत की दावेदारी सामने आने के बाद कांग्रेस के लिए कम से कम तीन स्तरों पर फैसला महत्वपूर्ण होगा।

पहला—स्थानीय दावेदार: जिस सीट पर आनंद के नाम पर विचार होगा, वहां पहले से सक्रिय कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।

दूसरा—संगठनात्मक संतुलन: पार्टी को यह तय करना होगा कि वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक विरासत और जमीनी संगठन की दावेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

तीसरा—उम्मीदवार चयन का संदेश: कांग्रेस जिस तरीके से आनंद की दावेदारी पर फैसला करेगी, उसका असर पार्टी के भीतर टिकट वितरण की प्रक्रिया को लेकर धारणा पर पड़ सकता है।

इनमें से किसी भी बिंदु पर अंतिम तस्वीर अभी सामने नहीं आई है।

हरीश रावत खुद भी चुनावी राजनीति में सक्रिय होने का संकेत दे चुके हैं

दिलचस्प रूप से आनंद की दावेदारी के साथ-साथ हरीश रावत स्वयं भी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सक्रिय संकेत दे रहे हैं। हाल में उन्होंने हरिद्वार जिले से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी।

इससे 2027 की कांग्रेस राजनीति में रावत परिवार की भूमिका को लेकर चर्चा और बढ़ गई है। हालांकि, किसी भी सीट पर अंतिम उम्मीदवार का फैसला कांग्रेस नेतृत्व की ओर से होना बाकी है।

असली परीक्षा टिकट मिलने के बाद नहीं, फैसला होने से पहले शुरू होगी

आनंद रावत के नाम की चर्चा अभी शुरुआती राजनीतिक चरण में है। उनके लिए पहला सवाल टिकट मिलने का नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर उनकी दावेदारी के स्वीकार किए जाने का होगा।

हरीश रावत ने अपने बयान से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने बेटे को चुनावी राजनीति में देखना चाहते हैं। दूसरी ओर, उन्होंने निर्णय का अधिकार पार्टी पर छोड़े जाने की बात भी कही है।

इसलिए 2027 से पहले इस पूरे घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव कांग्रेस की टिकट प्रक्रिया और संभावित सीटों पर सामने आने वाली दावेदारियां होंगी।

फिलहाल हरीश रावत के बयान ने उत्तराखंड कांग्रेस में एक पुरानी लेकिन लगातार प्रासंगिक बहस को फिर सामने ला दिया है—क्या राजनीतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए परिवार के चेहरे आगे आएंगे, या टिकट का आधार मुख्य रूप से स्थानीय संगठन और उम्मीदवार की राजनीतिक दावेदारी होगी?

इस सवाल का जवाब कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार चयन के बाद ही स्पष्ट होगा। इसी के साथ एक और बड़ी बहस भी कांग्रेस में शुरू हो चुकी है जो पार्टी के एक बड़े नेता के जरिए अपने परिवार के सदस्यों का पॉलिटिकल कैरियर सेट करने को लेकर जुड़ी है। 

Frequently asked questions

हरीश रावत ने अचानक क्यों उठाया आनंद का नाम?
हरीश रावत ने कहा है कि वह लंबे समय से आनंद से चुनाव लड़ने के लिए इंतजार करने को कहते रहे हैं। अब उनकी इच्छा है कि आनंद को विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक भूमिका स्थापित करने का अवसर मिले। रावत ने इसे अपनी राजनीतिक सोच और ‘उत्तराखंडियत’ की विचारधारा को आगे बढ़ाने से भी जोड़ा है।
आनंद रावत के लिए दावेदारी का आधार क्या है?
आनंद रावत पहले से कांग्रेस की राजनीति और संगठन से जुड़े रहे हैं। ऐसे में उनकी दावेदारी केवल पारिवारिक पहचान पर आधारित नहीं है। दूसरी तरफ, विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनना अलग राजनीतिक चुनौती है, जिसमें संबंधित क्षेत्र में संगठनात्मक नेटवर्क, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने क्या सवाल होंगे?
आनंद की दावेदारी सामने आने के बाद कांग्रेस के लिए कम से कम तीन स्तरों पर फैसला महत्वपूर्ण होगा।