बुधवार · विक्रम संवत् 2083 · आश्विन कृष्ण पक्ष · चतुर्थी

30 SEP 2026 · उत्तराखंड

उत्तराखंड : वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, उत्तराखंड की 13 ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क पर

वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निग सिस्टम

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से GLOF के खतरे पर वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने की तैयारी, CBRI और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की टीम करेगी सिस्टम स्थापित

देहरादून। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे से निपटने के लिए राज्य सरकार ने वैज्ञानिक निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। चमोली जिले की वसुंधरा ताल में प्रदेश का पहला ग्लेशियल लेक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है।

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर उच्च हिमालयी क्षेत्र के लिए रवाना किया। अभियान के दौरान अत्याधुनिक सेंसर, मौसम निगरानी उपकरण, जल प्रवाह मापन प्रणाली और सैटेलाइट कम्युनिकेशन के माध्यम से झील की स्थिति पर लगातार नजर रखने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।

29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलेगा अभियान

वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए भेजा गया यह उत्तराखंड की किसी ग्लेशियल झील में इस तरह की निगरानी प्रणाली लगाने वाला पहला वैज्ञानिक दल है। अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है।

इस अभियान में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं।

दुर्गम और उच्च हिमालयी क्षेत्र में अभियान की सुरक्षा तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी टीम के साथ रहेंगे।

झील के जलस्तर से लेकर बर्फ की गहराई तक होगी निगरानी

वसुंधरा ताल में स्थापित होने वाली प्रणाली सिर्फ जलस्तर की निगरानी तक सीमित नहीं रहेगी। अलग-अलग सेंसरों के जरिए झील और उसके आसपास के पर्यावरण में होने वाले बदलावों का रियल टाइम डेटा जुटाया जाएगा।

सिस्टम में प्रमुख रूप से जलस्तर सेंसर, ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन, स्नो डेप्थ सेंसर, स्नो सब-सर्फेस टेंपरेचर सेंसर, टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर और जल प्रवाह सेंसर लगाए जाएंगे।

ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुदाब और प्रकाश की तीव्रता जैसे मौसम संबंधी आंकड़े रिकॉर्ड करेगा। वहीं स्नो सेंसर आसपास मौजूद बर्फ की गहराई और अलग-अलग स्तरों पर तापमान में होने वाले बदलावों की जानकारी देंगे।

मोबाइल नेटवर्क नहीं तो सैटेलाइट से भेजा जाएगा डेटा

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। इसे देखते हुए अभियान में सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा।

इस व्यवस्था के जरिए सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजा जा सकेगा। टीम को USDMA की ओर से सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस भी उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे अभियान के दौरान संचार और समन्वय बनाए रखने में मदद मिलेगी।

डेटा लॉगर और मॉनिटरिंग डैशबोर्ड के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों को रिकॉर्ड और ऑनलाइन प्रदर्शित किया जाएगा। निर्धारित थ्रेशोल्ड से किसी पैरामीटर में असामान्य बदलाव होने पर अलर्ट जनरेशन की व्यवस्था भी होगी।

344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित, 13 को माना गया उच्च जोखिम वाली

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की संख्या और उनसे जुड़े संभावित जोखिम को देखते हुए वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत लगातार बढ़ रही है। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के वर्ष 2023 के आंकड़ों में राज्य में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं।

इनमें से 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें बागेश्वर की एक, चमोली की चार, पिथौरागढ़ की छह, टिहरी गढ़वाल की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल है।

यह वर्गीकरण संभावित GLOF जोखिम को ध्यान में रखते हुए किया गया है और इन झीलों की वैज्ञानिक एवं तकनीकी जांच पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

छह हाई रिस्क झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वे पूरा

उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की स्थिति समझने के लिए बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण भी कराया जा रहा है। अब तक छह झीलों का यह सर्वे पूरा हो चुका है।

इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी स्थित मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं।

बाथीमेट्रिक सर्वे के जरिए झील की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए जाते हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल संभावित जोखिम के वैज्ञानिक आकलन और आपदा प्रबंधन की तैयारियों में किया जा सकता है।

GLOF की स्थिति में निचले क्षेत्रों को हो सकता है खतरा

ग्लेशियल झीलों के आसपास बर्फ, हिमनद और पानी की स्थिति में अचानक बदलाव होने पर झील के बांध जैसे प्राकृतिक अवरोध के टूटने या पानी के अचानक बाहर निकलने का जोखिम पैदा हो सकता है। ऐसी घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।

ऐसी संभावित घटनाओं के प्रभाव का दायरा सिर्फ झील तक सीमित नहीं रहता। निचले क्षेत्रों में स्थित बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण अवस्थापना पर भी इसका असर पड़ सकता है।

इसी वजह से शुरुआती स्तर पर बदलावों की पहचान और समय रहते चेतावनी जारी करने की क्षमता आपदा प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

वसुंधरा ताल से आगे बढ़ेगी निगरानी व्यवस्था

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार, अत्याधुनिक सेंसर, सैटेलाइट संचार और रियल टाइम डेटा मॉनिटरिंग से ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि वसुंधरा ताल में शुरू की जा रही यह पहल भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में भी ऐसी प्रणालियां स्थापित करने का आधार तैयार कर सकती है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सुरक्षा बलों को शुभकामनाएं दी हैं। वहीं आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को राज्य की प्राथमिकताओं में शामिल बताया है।

राज्य सरकार के अनुसार, वैज्ञानिक संस्थानों, विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के समन्वय से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को चरणबद्ध तरीके से मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

Frequently asked questions

GLOF क्या होता है?
GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood ग्लेशियल झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलने की घटना है। इससे निचले क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और बुनियादी ढांचे तथा आबादी को खतरा हो सकता है।
उत्तराखंड में कितनी ग्लेशियल झीलें चिह्नित हैं?
NRSC के वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं।