1 जनवरी 1951 को जन्मे विश्वनाथ पाटेकर को दुनिया बाद में 'नाना पाटेकर' के नाम से जानने लगी। 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में नाना पाटेकर के निधन की खबर सामने आई। उनके निधन के साथ उनके जीवन, संघर्ष और पांच दशक लंबे फिल्मी करियर को एक बार फिर याद किया जा रहा है।
नाना पाटेकर का असली नाम क्या था?
नाना पाटेकर का जन्म नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उन्होंने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से पढ़ाई की थी और कला में उनकी रुचि काफी पहले से थी।
फिल्मों की चमक-दमक में आने से पहले उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक मुश्किलों के बीच उन्होंने छोटी उम्र से ही काम किया। यही संघर्ष बाद में उनके अभिनय में दिखाई भी दिया। उनके अभिनय में अक्सर आम आदमी की बेचैनी, गुस्सा और दर्द नजर आता था।
पोस्टर पेंट करने से शुरू हुआ संघर्ष
नाना पाटेकर के शुरुआती जीवन से जुड़ी कई कहानियां बताती हैं कि फिल्मों में आने से पहले उन्होंने आर्थिक तंगी का सामना किया। बताया जाता है कि वह फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम भी करते थे।
उनका शुरुआती सफर किसी स्टार किड जैसा नहीं था। उन्होंने धीरे-धीरे थिएटर और अभिनय की दुनिया में अपनी जगह बनाई। यही वजह है कि नाना पाटेकर की सफलता की कहानी में संघर्ष का हिस्सा काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
थिएटर से फिल्मों तक पहुंचे नाना
नाना पाटेकर ने अभिनय की शुरुआत थिएटर से की और बाद में फिल्मों का रुख किया। उनका फिल्मी करियर 1970 के दशक के अंत में शुरू हुआ। उनकी शुरुआती फिल्मों में 'गमन' का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
शुरुआती दौर में उन्हें तुरंत वह पहचान नहीं मिली जिसके लिए वह बाद में जाने गए। लेकिन लगातार काम करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे इंडस्ट्री में अपनी जगह मजबूत की।
'परिंदा' ने बदल दिया करियर
1989 में आई 'परिंदा' नाना पाटेकर के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक साबित हुई। फिल्म में उनके अभिनय को व्यापक प्रशंसा मिली और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तथा फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
'परिंदा' के बाद यह साफ हो गया कि नाना पाटेकर सामान्य अभिनेता नहीं हैं। इस फिल्म ने न सिर्फ उन्हे इंडस्ट्री में स्थापित किया बल्कि अब उनको ध्यान में रख कर रोल भी लिखे जाने लगे।
'क्रांतिवीर' ने बना दिया राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता
1994 में रिलीज हुई 'क्रांतिवीर' नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल है। फिल्म में प्रताप नारायण तिलक के किरदार में उन्होंने जिस तरह का अभिनय किया, उसने उन्हें दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।
इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
'क्रांतिवीर' के बाद नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ एक बेहतरीन चरित्र अभिनेता के रूप में नहीं रही। वह मुख्यधारा के ऐसे अभिनेता बन गए जिनके नाम पर फिल्म की चर्चा हो सकती थी।
'अग्निसाक्षी' और 90 के दशक का शानदार दौर
इसके बाद नाना पाटेकर ने कई अलग-अलग भूमिकाएं कीं। 'अग्निसाक्षी' में उनके अभिनय की खूब चर्चा हुई और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।
'खामोशी: द म्यूजिकल', 'तिरंगा', 'अंगार', 'राजू बन गया जेंटलमैन' जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग पहलू दर्शकों के सामने रखे।
उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वह भूमिका को अपने व्यक्तित्व के मुताबिक ढालने के बजाय खुद को भूमिका के मुताबिक बदल लेते थे।
'अब तक छप्पन' में पुलिस अफसर बनकर फिर छा गए
2004 में आई 'अब तक छप्पन' नाना पाटेकर के करियर की एक और अहम फिल्म थी। इसमें उन्होंने पुलिस अधिकारी साधु आगाशे की भूमिका निभाई।
फिल्म में उनका किरदार शांत भी था और खतरनाक भी। उनकी संवाद अदायगी और आंखों के भाव ने किरदार को यादगार बना दिया।
नाना पाटेकर की खासियत यही रही कि वह कम शब्दों में भी दृश्य का असर बढ़ा देते थे।
'वेलकम' ने दिखाई उनकी कॉमेडी की दूसरी दुनिया
बहुत से दर्शक नाना पाटेकर को गंभीर फिल्मों और आक्रामक किरदारों के लिए जानते थे। लेकिन 2007 की 'वेलकम' ने उनकी कॉमेडी टाइमिंग को भी घर-घर पहुंचा दिया।
उदय शेट्टी के किरदार में नाना पाटेकर ने जिस तरह गंभीर चेहरे के साथ हास्य पैदा किया, वह फिल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से एक था।
अनिल कपूर के मजनू भाई और नाना पाटेकर के उदय शेट्टी की जोड़ी आज भी बॉलीवुड की लोकप्रिय कॉमिक जोड़ियों में गिनी जाती है।
'राजनीति' से लेकर 'नटसम्राट' तक
2010 में आई प्रकाश झा की 'राजनीति' में नाना पाटेकर ने एक बार फिर गंभीर और प्रभावशाली भूमिका निभाई। इसके बाद भी उन्होंने लगातार फिल्मों में काम किया।
मराठी सिनेमा में उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में 'नटसम्राट' शामिल रही। इसमें उन्होंने एक ऐसे रंगमंच कलाकार का किरदार निभाया जो उम्र के आखिरी पड़ाव में अपने जीवन और रिश्तों को नए तरीके से देखता है।
इस भूमिका ने एक बार फिर साबित किया कि नाना पाटेकर उम्र के किसी भी पड़ाव पर अभिनय की गहराई को कम नहीं होने देते थे।
नाना पाटेकर का आर्मी से क्या कनेक्शन था?
नाना पाटेकर की जिंदगी का एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय सेना से उनका जुड़ाव भी रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी से जुड़कर सैन्य प्रशिक्षण लिया था और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सेना के साथ समय बिताया था।
उनका सैनिकों और सेना के प्रति सम्मान उनकी सार्वजनिक छवि का भी हिस्सा रहा। फिल्मों में सैनिकों या देशभक्ति से जुड़े किरदारों को निभाने वाले कई कलाकारों से अलग, नाना पाटेकर ने वास्तविक जीवन में भी सेना के साथ जुड़ने का अनुभव लिया था।
अभिनय के साथ समाजसेवा भी बनी जिंदगी का हिस्सा
नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ अभिनेता के रूप में नहीं रही। महाराष्ट्र में किसानों की समस्याओं और सूखे की स्थिति ने उन्हें काफी प्रभावित किया।
इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ सितंबर 2015 में NAAM Foundation की शुरुआत की। संस्था का उद्देश्य किसानों और ग्रामीण परिवारों की मदद करना तथा सूखे और जल संकट से प्रभावित इलाकों में स्थायी समाधान तैयार करना रहा है।
NAAM Foundation की गतिविधियों में जल संरक्षण, खेती में नए तरीकों को बढ़ावा देना, किसानों को सहायता देना और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य शामिल हैं।
यानी नाना पाटेकर की जिंदगी का दूसरा अध्याय कैमरे से बाहर शुरू होता है, जहां वह किसानों और ग्रामीण समुदायों से जुड़े मुद्दों पर काम करते नजर आए।
नाना पाटेकर को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
नाना पाटेकर के खाते में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के साथ कई बड़े फिल्म पुरस्कार दर्ज हैं। उन्होंने 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अग्निसाक्षी' जैसी फिल्मों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हासिल किया।
2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
लेकिन नाना पाटेकर के लिए शायद सबसे बड़ा पुरस्कार वह सम्मान था जो उन्हें दर्शकों से मिला। उनकी फिल्मों के संवाद आज भी सोशल मीडिया और आम बातचीत में सुनाई देते हैं।
निजी जिंदगी को हमेशा रखा लाइमलाइट से दूर
नाना पाटेकर उन सितारों में रहे जिन्होंने अपनी निजी जिंदगी को फिल्मों की तरह सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनने दिया। वह अक्सर अपने काम को लेकर चर्चा में रहे और निजी जिंदगी को लेकर कम बोलते थे।
उनका बेटा मल्हार पाटेकर भी फिल्म निर्माण से जुड़ा रहा है। नाना पाटेकर ने हालांकि अपने परिवार को फिल्मी ग्लैमर का हिस्सा बनाने के बजाय अपने काम को प्राथमिकता दी।
मौजूदा दौर में कहां थे नाना पाटेकर?
नाना पाटेकर अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी अभिनय से पूरी तरह दूर नहीं हुए थे। 2023 में 'द वैक्सीन वॉर' और 'गदर 2' जैसी फिल्मों में नजर आने के बाद उन्होंने 2024 में 'वनवास' और 2025 में 'हाउसफुल 5' में काम किया। 2026 में भी उनके नाम 'ओ' रोमियो' और 'सुबेदार' जैसे प्रोजेक्ट जुड़े रहे।
जनवरी 2026 में 'ओ' रोमियो के ट्रेलर लॉन्च से जुड़ी एक घटना में भी वह चर्चा में आए थे। कार्यक्रम में काफी देर होने के बाद नाना पाटेकर वहां से चले गए थे। इस घटना ने एक बार फिर उनकी समय की पाबंदी और काम को लेकर गंभीर रवैये को चर्चा में ला दिया था।
उनके निधन से ठीक पहले सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक वह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर थे, जहां उन्हें बेहोशी की हालत में पाया गया। बाद में अस्पताल में उन्हें मृत घोषित किया गया।
नाना पाटेकर की विरासत क्या है?
नाना पाटेकर की विरासत को केवल उनकी फिल्मों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा में यह दिखाया कि एक अभिनेता बिना पारंपरिक 'हीरो' वाली छवि के भी दर्शकों के दिल पर लंबे समय तक राज कर सकता है।
उनकी आवाज अलग थी, संवाद बोलने का तरीका अलग था और अभिनय की शैली भी अलग थी। वह स्क्रीन पर आते थे तो दर्शक को पता होता था कि अब कुछ ऐसा होने वाला है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।
एक तरफ 'क्रांतिवीर' का गुस्सा था, दूसरी तरफ 'अब तक छप्पन' का ठंडा लेकिन खतरनाक पुलिस अधिकारी और तीसरी तरफ 'वेलकम' का उदय शेट्टी। इन सभी किरदारों में एक चीज समान थी—नाना पाटेकर की अपनी पहचान।
75 साल की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने सिर्फ एक अभिनेता नहीं खोया है। उसने एक ऐसी आवाज खोई है जिसे सुनते ही किरदार पहचान में आ जाता था।
नाना पाटेकर की फिल्मों को आने वाली पीढ़ियां देखेंगी, उनके संवाद दोहराए जाएंगे और उनके किरदारों पर चर्चा होती रहेगी। यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी विरासत होती है।